कोरस का वार्षिक संगीत कार्यक्रम “नवरस” में दिखीं मानवीय भावनाओं की झलक।।

रिपोर्ट- अरविन्द पाण्डेय

प्रयागराज। सांस्कृतिक केन्द्र प्रेक्षागृह में आयोजित संगीत संस्था कोरस के वार्षिक कार्यक्रम नवरस में कलाकारों ने मानवीय जीवन की नौ भावनाओं को गीतों के माध्यम से जीवंत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की परिकल्पना संस्था के संस्थापक व नगर के वरिष्ठ आर्किटेक्ट पीयूष टंडन ने की थी। उनका कहना था कि नृत्य-अभिनय से रसों की प्रस्तुति आम है, परंतु संगीत के माध्यम से उन्हें अभिव्यक्त करना विशेष अनुभव देता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। प्रमुख सलाहकार विनय टंडन ने अतिथियों का स्वागत किया तथा रश्मि गोडबोले ने सदस्यों का परिचय कराया। संचालन रुचि दुबे ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत एक मेडले से हुई जिसमें सभी नौ रसों—श्रृंगार, हास्य, करूण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांति—की संगीतमय झलक प्रस्तुत की गई। इसके बाद प्रत्येक रस पर केंद्रित सोलो व डुएट गीतों की प्रस्तुति हुई।श्रृंगार रस में लता माहेश्वरी का “बरसात ना धरो बलमा”, राजेश श्रीवास्तव का “चंदन सा बदन” और नीरू-सुलभ का युगल गीत “बेखुदी में सनम” विशेष सराहे गए। हास्य रस में हर्ष टंडन का “बड़े मियां दीवाने” और शैलेन्द्र प्रताप सिंह का “मेरा जूता है जापानी” ने वातावरण में हास्य का पुट घोला। करूण रस में अर्चना त्रिपाठी का “हम थे जिनके सहारे” और कल्पना टंडन का “रैना बीती जाए” ने दर्शकों को भावुक कर दिया।रौद्र रस में पीयूष टंडन की दमदार प्रस्तुति “कितने अटल थे तेरे इरादे” तथा वीर रस में संजीव त्रिपाठी का “आरंभ है प्रचंड” ने जोश भर दिया। भयानक रस में नीरू गुलाटी का “कहीं दीप जले कहीं दिल” और वीभत्स रस में “ये दुनिया ये महफिल” जैसे गीत प्रभावशाली रहे। अद्भुत रस में “जिंदगी कैसी है पहेली हाय” और शांत रस में “ओ रे मनवा तू तो बावरा” ने कार्यक्रम का समापन किया।

धन्यवाद ज्ञापन पीयूष टंडन ने किया। इस अवसर पर न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति राजेश कुमार, न्यायमूर्ति अशोक कुमार सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। दर्शकों की तालियों से कार्यक्रम की सफलता का सहज अनुमान लगाया जा सकता था।

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