
रिपोर्ट- नीरज कुमार त्रिपाठी
नई दिल्ली, 12 सितम्बर। हिन्दी पखवाड़ा-2025 एवं आगामी हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) के उपलक्ष्य में भारतीय भाषा अभियान, दिल्ली प्रान्त की उच्च न्यायालय इकाई तथा यूको बैंक के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली उच्च न्यायालय परिसर में “जनता को न्याय, जनता की भाषा में” विषय पर एक शैक्षणिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का मुख्य विषय था – “भारतीय भाषाएँ : विधि एवं न्याय”।
कार्यक्रम में दिल्ली उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह, न्यायमूर्ति सुबरमोनियम प्रसाद, भारत के अतिरिक्त महा-न्यायभिकर्ता (सॉलिसिटर जनरल) चेतन शर्मा, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता एवं भारतीय भाषा अभियान के राष्ट्रीय संयोजक जयदीप राय, ए.आई.सी.टी.ई. के मुख्य समन्वयक अधिकारी डॉ. बुद्धा चंद्रशेखर तथा यूको बैंक के महाप्रबंधक (कारोबार विस्तार, दिल्ली) अम्बिकानन्द झा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।संगोष्ठी का शुभारंभ अधिवक्ता मनंजय कुमार मिश्र द्वारा भारतीय न्याय व्यवस्था के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर विचार रखते हुए हुआ। इसके उपरांत अतिथियों ने संगोष्ठी के विषय पर अपने-अपने विचार रखे।
डॉ. बुद्धा चंद्रशेखर ने ए.आई. संचालित अनुवादक अनुप्रयोग “अनुवादिनी” की जानकारी दी, जिससे न्यायपालिका और आमजन को मातृभाषा में न्याय सुलभ कराने में मदद मिल सकेगी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में इन भाषाओं का प्रयोग जनता तक न्याय पहुँचाने में सहायक है।
यूको बैंक के महाप्रबंधक अम्बिकानन्द झा ने बैंकिंग कार्य में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग से ग्राहकों को हुए लाभों के अनुभव साझा किए। वहीं, सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने संस्कृत और हिन्दी की महत्ता पर विचार व्यक्त करते हुए संविधान में वर्णित राजभाषा प्रावधानों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।न्यायमूर्ति सुबरमोनियम प्रसाद ने सारांश प्रस्तुत करते हुए कहा कि भाषा जनता को न्याय से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है और न्याय प्रणाली को जनता की भाषा में उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है।कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय संयोजक जयदीप राय के संबोधन व दिल्ली प्रान्त संयोजक राघवेन्द्र शुक्ला एवं सह-संयोजक कृष्ण कुमार शर्मा द्वारा आभार ज्ञापन के साथ हुआ। राष्ट्रगान के उपरांत संगोष्ठी सम्पन्न हुई।
संगोष्ठी में एक स्वर से यह मत सामने आया कि न्याय, शिक्षा एवं शासन में भारतीय भाषाओं का अधिकाधिक प्रयोग कर जनता को उनकी मातृभाषा व हिन्दी में न्याय एवं सेवाएँ सुलभ कराना समय की मांग है।
